सचेत रहें , सुरक्षित रहें - ई सब बकवास है

टीवी वाले समाचार में दिखा रहा था जिसमे एक महिला सुबह सुबह सड़क किनारे टहल रही है और एक बहुते लम्बा तरकुल का पेंड ठीक उसके ऊपर गिरता है , और उ खतम ।

हाल ही में आचार्य श्री बालाकृष्णा जी जो एक योग गुरु और आयुर्वेदाचार्य हैं हमेशा अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत और दूसरों को भी जागरूक करते रहते हैं । एक कार्यक्रम के दौरान वे एक पेड़ा खा लेते हैं , जिसके कारण उन्हें फूड प्वाइजनिंग हो जाता है , सीने में इतनी तेज दर्द कि बेहोशी छाने लगती है और उन्हें एम्स में भर्ती कराना पड़ता है ,  यह सब अचानक हो रहा है।

हाईवे जोकि फोर लेन था, सामने से एक कार सामान्य गति से आ रही थी और विपरीत साइड से एक तेज रफ्तार कार उधर जा रही थी , अचानक तेज रफ्तार अनियंत्रित होती है और डिवाइडर से टकराकर उस पार  जाती हैं और उस सामान्य रफ्तार से आने वाली कार के साथ इतनी जोर से टकराती है कि उसके परखच्चे उड़ जाते हैं और उसमें सवार सभी  खतम ।

ई सब हम काहें बकबकीया रहे हैं ? काहें कि हमको लगता है कि ई नारा “ सचेत रहें , सुरक्षित रहें ” सब बकवास है।

विपत्ति आपसे हमसे कब टकरा जाए ! न आप जानते हैं न हम न कोई और । हमने यह महसूस किया है कि हमारी बुद्धि -  विवेक सब काम करना बंद कर देता है जब कोई हमारे साथ घटना होने वाली होती है। या यूं कहें विवेक पर कुछ देर के लिए पर्दा पड़ जाता है और दुर्घटना हो जाती है ! तो इसे हम क्यों न कहें - नियति , होनी अथवा भाग्य । व्यवहारवादी या तर्कशास्त्री यह जरूर कहते हैं कि यह सब हमारी मानसिक क्षमता के कारण होता है। ये लोग कहते हैं कि व्यक्ति अपनी कमियों को, अपनी कमजोरियों को छिपाने के लिए एक कल्पित नियत /भाग्य /होनी को दोष देते हैं।
पर पता नहीं काहें हमार मनवा ई मानने को तैयारे नहीं है।

कर्मपथ पर मैं भी विश्वास करता हूं पर मुझे लगता है कि अच्छे काम भी वही कराता है और बुरे काम भी वही कराता है। रहीम जी के बारे में भजन सम्राट कहे जाने वाले अनूप जलोटा एक बड़ा ही अच्छा प्रसंग सुनाते हैं , कहते हैं कि रहीम , स्वभाव के बड़े दानी व्यक्ति थे । वह जब भी किसी को कुछ दान देने के लिए हाथ आगे बढ़ाते थे तो वे उसके साथ साथ वह अपना सर नीचे झुका लेते थे।
इसके बारे में जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने उत्तर दिया कि “ देने वाला तो कोई और है , यह लोग भ्रमवस मुझे ही समझ रहे हैैं। ”

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